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आंख खोलने वाली फिल्म- द ग्रेट हैक- अरुण माहेश्वरी
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आज नेटफ्लिक्स पर दो घंटे का एक प्रकार का वृत्त चित्र देखा — The Great Hack । 2016 में ट्रंप के चुनाव और फिर इंगलैंड में ब्रेक्सिट पर हुए जनमत-संग्रह में डाटा विश्लेषण के काम में लगी एक कंपनी कैम्ब्रिज एनालिटिका (सीए) के कामों पर केंद्रित फिल्मनुमा वृत्तचित्र । इन दोनों मामलों में ही कैम्ब्रिज के कामों को यूरोप और अमेरिका की अदालतों में चरम अपराधपूर्ण पाया गया और अब तो उस कंपनी का रहस्यमय ढंग से नामो-निशान ही जैसे मिट गया है । इसके खिलाफ अपराधी मामलों में इसके अंदर के ही तमाम लोग मुखबिर बन गये थे । लोगों के व्यवहार का अध्ययन, एक दो नहीं, एक साथ लाखों लोगों के नितांत निजी व्यवहार का अध्ययन । अर्थात् एक देश की बड़ी आबादी के प्रत्येक सदस्य का संपूर्ण मनोवैज्ञानिक अध्ययन । अकेले सीए के पास अमेरिका के कुल आठ करोड़ सत्तर लाख लोगों के सारे डाटा उपलब्ध थे । गूगल, फेसबुक, अमेजन, टेस्ला आदि दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों की पूंजी है उनके पास उपलब्ध लोगों के बारे में डाटा का विशाल खजाना । इनके लिये आदमी ही इनका माल है । वे आदमी संबंधी सूचनाओं का नाना रूप में इस्तेमाल करके, यहां तक कि बेच कर भी खरबों डालर का अपना कारोबार चलाते हैं । दुनिया में जितने ऑनलाइन ऐप तैयार किये जाते हैं, वे सभी इन जानकारियों के आधार पर ही होते हैं जिनसे आम लोगों की जरूरतों का पता सिलिकन वैली के ऐप तैयार करने वालों को रहता है । बहरहाल, आदमी के व्यवहार से जुड़े जो डाटा अब तक उपभोक्ता मालों की बिक्री आदि के उद्देश्य से प्रयुक्त हो रहे थे, कैम्ब्रिज एनालिटिका में एलेक्सांद्र निक्स, ब्रिटनी काइसर, नाइगल फरागो, क्रिस्टोफर वाइले आदि ने उनका इस्तेमाल ट्रंप के चुनाव में और फिर ब्रेक्सिट में इतने बड़े पैमाने पर किया कि उन्होंने एक झटके में लोगों की राय को विकृत करके पासा पलट दिया । इनका भंडाफोड़ तब हुआ जब पॉल ओलिवर नाम के एक व्यक्ति ने खुद के बारे में कैम्ब्रिज एनालिटिका (सीए) के द्वारा जुटाये गये डाटा के खिलाफ मुकदमा करके यह स्थापित किया कि डाटा का अधिकार किसी भी व्यक्ति का अपना मूलभूत अधिकार है, इसके मनमाने इस्तेमाल की किसी को भी अनुमति नहीं मिल सकती है । उसने सीए को अपने बारे में डाटा के दुरुपयोग का अपराधी साबित कर दिया । बाद में तो अमेरिकी सीनेट और ब्रिटेन की पार्लियामेंट्री कमेटी के सामने फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग को भी सीए के साथ उनके संबंधों पर सफाई देने के लिये बुलाया गया था । सीए ने अमेरिकी चुनाव के लिये जिस प्रकल्प पर काम किया था उसका नाम था — प्रोजेक्ट एलामो । ब्रिटनी काइसर और उसके साथी अपने को डाटा साइंटिस्ट कहते हैं । ब्रिटनी 2015 के नवंबर महीने में ट्रंप से मिली थी । किसी समय में वह ओबामा के साथ काम कर रही थी । उनके फेसबुक पेज को देखती थी । लेकिन बाद में शुद्ध रूप से पैसों की खातिर ही उसने बिल्कुल विरोधी पक्ष के लिये काम करना शुरू कर दिया । कैम्ब्रिज एनालिटिका की बिजनेस डाइरेक्टर बन गई । सीए के इस समूह ने लोगों के बारे में सभी आनलाइन स्रोतों से सूचना एकत्रित करके उसे इतना विकसित कर लिया था जिसमें एक व्यक्ति को परिभाषित करने के लिये उनके पास पांच हजार डाटा प्वायंट, अर्थात् उसके चरित्र से जुड़ी पांच हजार विशेषताओं से लेकर सत्तर हजार डाटा प्वायंट तक इकट्ठे हो जाते हैं । वे उनके आधार पर किसी भी समूह के हर आदमी के व्यक्तित्व को जैसे पूरी तरह से परिभाषित कर सकते थे । इन सूचनाओं के आधार पर ही सीए ने आबादी के निश्चित समूहों में उन लोगों की शिनाख्त कर ली जो अपने मत पर दृढ़ नहीं होते हैं और जिन्हें थोड़े से प्रयासों से अपने पक्ष में लिया जा सकता है । अपनी इन्हीं सूचनाओं के विश्लेषण से वे यह भी समझ जाते हैं कि वे कौन सी बातें हैं जिन पर उन व्यक्तियों को भ्रमित करके उन्हें अपने पक्ष में किया जा सकता है । और फिर व्हाट्स ऐप आदि के जरिये वे उन लोगों के पास उन्हीं भ्रामक सूचनाओं की बमबारी शुरू करके अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं । ट्रंप के चुनाव के वक्त बिल्कुल आखिरी वक्त में उन्होंने ‘Defeat Crooked Hillary’ का एक जोरदार उन्मादित अभियान चलाया था जिसने ट्रंप को हिलैरी पर बढ़त दिला दी । इस फिल्म में अमेरिका के सामरिक ठेकों की कंपनी एससीएल का उल्लेख आता है, जिसके एलेक्सांद्र निक्स नें ब्रिटनी काइसर आदि को साथ में लेकर चुनावों को प्रभावित करने के इस धंधे में, कैम्ब्रिज एनालिटिका में अपने को लगा दिया और देखते-देखते उनकी कंपनी को खरबों डालर की कंपनी कहा जाने लगा । सीए पर यूरोपियन पार्लियामेंट की तरफ से यह अभियोग लगाया गया था कि इस कंपनी ने जनतंत्र और राष्ट्रीय सार्वभौमिकता को नष्ट करने की साजिश की है । फेसबुक का जुकरबर्ग दावा कर रहा था कि उनका उद्देश्य लोगों के बीच संपर्क साधना है, उससे कहा गया कि तुम लोगों को जोड़ते नहीं, तोड़ते हो । सीए के साथ फेसबुक के संबंध के लिये उस पर भारी जुर्माना लगाया गया और वह फिर कभी अपने डाटा का सौदा इस प्रकार न करे, इसके लिये चेतावनी भी दी गई । इस फिल्म को देख कर हम अपने देश में प्रशांत किशोर की तरह के पेशेवरों की भारत के चुनावों में भूमिका को कुछ हद तक समझ सकते हैं । मोदी ने पिछले दिनों भारत में सरकारी मशीनरी के जरिये भी आम नागरिकों के डाटा इकट्ठा करने की कोशिश की थी। आधार कार्ड को अनिवार्य बनाने के पीछे भी मोदी सरकार का पूरा रवैया यही था । इससे यह भी पता चलता है कि पार्टियों का पारंपरिक, निरंतर चलने वाला बहु-स्तरीय प्रचार अभियान महज चुनावों में जीत की दृष्टि से क्रमशः कितना व्यर्थ बना दिया जा रहा है । पार्टी के परंपरागत कार्यकर्ता का भी इसके चलते भारी अवमूल्यन हुआ है । आज जिस प्रकार भारत की तमाम पार्टियों के नेतागण भाजपा में जा रहे हैं, उनके पीछे भी इसी प्रकार की शरारतपूर्ण डाटा एनालिसिस की भूमिका से कोई इंकार नहीं कर सकता है । कौन किस बिंदु पर दब सकता है और बीजेपी में जा सकता है, इसकी सूचना आज बीजेपी के दफ्तर में उसके अध्यक्ष की उंगलियों पर रहता हो तो कोई अचरज की बात नहीं है । 2014 के मोदी के चुनाव में भी सीए की भूमिका की बात कुछ हलकों से उठाई जाती रही है । इस फिल्म में ही एक प्रसंग में कहा गया है कि डाटा संग्रह और उनके प्रयोग के क्षेत्र में जिस पैमाने पर और जिस तेजी से अभी काम हो रहा है, उसमें आने वाले समय में हर महत्वपूर्ण मौके पर आम लोगों को भ्रमित करने के लिये कोई न कोई कैम्ब्रिज एनालिटिका निश्चित तौर पर मौजूद रहेगा, भले ही बाद में इस प्रकार के दुष्प्रचार का शिकार बनने के लिये किसी भी राष्ट्र को पछताना पड़े। (अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक और स्तंभकार हैं आप आजकल कोलकाता में रहते हैं।)


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