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जब पहली बार खेला गया 'जिस लाहौर...
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नब्बे के बाद के दशक में किसी एक महत्त्वपूर्ण हिंदी नाटक का नाम लेने के लिये कहा जाये तो अधिकांश जिस एक नाटक का नाम लेंगे वह है, जिस लाहौर नई वेख्या वो जम्याइ नई. नाटककार - असगर वज़ाहत. भारत के हर बड़े नाट्य समारोह में, हर बड़े शहर में, विविध भारतीय भाषाओं में इसका मंचन लगातार होता रहा है. आज भी दिल्ली में ही दो तीन मंडलियाँ इस नाटक का मंचन करती रहती है. प्रस्तुत है हबीब तनवीर निर्देशित इस नाटक की पहली प्रस्तुति की कहानी: जिस लाहौर... की प्रस्तुति हबीब तनवीर ने श्रीराम सेंटर रेपर्टरी के लिये की थी. फोर्ड फ़ाउंडेशन ने, जो भारत में रंगमंच के क्षेत्रमें अनुदान दे रहा था, नए नाटककारों को प्रोत्साहन देने के लिये एक योजना की शुरुआत की थी. इसके अंतर्गत हिंदी लेखको से नए नाट्यालेखों को आमंत्रित किया जाता था और संभावनायुक्त होने पर उनको मंचित किए जाने का प्रावधान भी था. इसी योजना के तहत असगर वज़ाहत के इस नाटक के मंचन का निर्णय हुआ था असगर वज़ाहत ने यह आलेख मूलतः टेलीविजन के लिये लिखा था. इस नाटक के वाचन का प्रथम आयोजन जब वज़ाहत जी ने किया था तो उसमें आमंत्रित निर्देशक ही नहीं पहुंचे थे. हबीब तनवीर ने अचानक एक दिन असगर वज़ाहत से यह नाटक मंचित करने के लिये मांगा. वज़ाहत को आश्चर्य हुआ था कि यथार्थवादी शैली के नाटक को हबीब तनवीर करेंगे कैसे? वैसे इससे पहले हबीब साहब एक और द्रोणाचार्य, मोटेराम का सत्याग्रह और दुश्मन जैसी यथार्थवादी शैली के नाटक सफ़लता से मंचित कर चुके थे लेकिन उसमें भी यथार्थवाद को प्रस्तुत करने की उन्होंने अपनी शैली बना ली थी. इस नाटक को भी इसी शैली में प्रस्तुत किया गया. जिससे वज़ाहत जी को अप्रसन्नता भी हुई क्योंकि उनके अनुसार उन्होंने नाटक में हास्य और अतिनाटकीया और भावुकता भर कर मूल चेतना को ही कुंठित कर दिया था. असगर वज़ाहत का यह नाटक पाकिस्तान विस्थापित होकर आए एक लखनवी परिवार को दिखाता है जिसकी अलाट हुई कोठी में एक वृद्धा पहले से रहती है. यह वृद्धा हिंदु है, जिसका परिवार दंगों में समाप्त हो चुका है. सिकंदर मिर्जा के परिवार का वृद्धा से पहले विरोध और फ़िर उसके व्यवहार के कारण सामंजस्य हो जाता है. मोहल्ले के पहलवान की मंशा मकान पर कब्जा करने की है वह वृद्धा के अस्तित्व को बर्दाश्त नहीं कर पाता. वृद्धा पूरे मोहल्ले की धरोहर बन जाती है. इस नाटक में एक वास्तविक पात्र नासिर काज़मी है जिसके संवादों से तत्कालीन हालात उभरते हैं. नासिर ही कहते हैं कि नंगा आदमी नंगा होता है, न हिंदु होता है न मुसलमान अम्मा को बचाना एक आवरण को बचाना है. हबीब के रंग भाषा की विशेषता रही है दो विरोधी स्थितियों और चरित्रों की पहचान और उनके जरिये सामाजिक विडंबना को संप्रेषित करना. इस नाटक में दो विरोधी चरित्र हैं मौलवी और पहलवान. मौलवी मज़हबी आदमी है और पांच वक्ती नमाज़ी है. पहलवान पूरा लंठ है. पहलवान हर वक्त धर्म की दुहाई देता है और मौलवी मजहब का असली मर्म समझाते हैं लेकिन वह उनकी व्याख्या को न मान कर उनकी हत्या कर देता है. एक मुर्ख ही कट्टर हो सकता है हबीब ने इस तथ्य को अपनी प्रस्तुति में उभारा था. असगर वज़ाहत ने आलेख को एपिसोडिक अंदाज में लिखा था. हबीब तनवीर ने नाटक की प्रस्तुति से पहले आलेख को सुगठित किया. इसका संपादन करके इसे उन्नीस से नौ दृश्यों में बदल दिया. इस क्रम में उन्होंने छोटे दृश्यों को मिला दिया और दृश्य जोड़ने के लिए कोरस का प्रावधान कर दिया. कोरस के गीतों के लिये उन्होंने नाटक में पात्र नासिर काज़मी के अलावा अल्लामा इकबाल, फ़िराक गोरखपुरी, साहिर लुधियानवी, अमृता प्रीतम के ग़ज़लो और नज़्मों का इस्तेमाल किया. नाटक की शुरूआत दंगो के दृश्य से होती है और फ़िर बंटवारा दिखाया जाता है जिसमें लोग इधर से उधर आ जा रहे हैं और इसके बाद कोरस आकर गाना शुरू करते हैं. और नतीजे में हिंदोस्तां बंट गया/ये जमीं बंट गई आसमां बंट गया इस गीत के शुरूआत से ही प्रस्तुति रंग पकड़ लेती है फ़िर शैलीबद्ध ढंग से दृश्य के बीच अंतराल को भरने के लिये हर दृश्य के बाद एक गीत आता है. प्रयुक्त गीत नाटक के कथ्य को एक आधार देता है, इसके तनाव को और गाढा करता है. हबीब तनवीर ने इस प्रस्तुति में गीतों का संयोजन इतने ज़हीन तरीके से किया था कि एक अन्य प्रस्तुति में जब अन्य निर्देशक ने दूसरे गीत का इस्तेमाल किया तो नाटक का रंग ही दूसरा हो गया क्योंकि उन गीतों में तनाव धारण करने की क्षमता नहीं थी. प्रस्तुति में अमृता प्रीतम की हीर जब नगीन तनवीर गाती हैं तो वे विभाजन के पूरे दर्द को समेट लाती हैं. हबीब तनवीर ने नाटक में व्याप्त ग़म को हल्का करना के लियो हास्य का इस्तेमाल किया था और ये उनकी शैली भी थी, गंभीर से गंभीर बात को वे इस शैली में सहज ढंग से कह जाते थे. इसके लिये अभिनेताओं को संवाद की जो भंगिमाएं दी थी कुछ उससे भी हास्य उभरता था. हास्य उनकी प्रयोगशीलता का अहम हिस्सा है और कहा जा चुका है कि यह रंजक राहत है. जावेद और सिकंदर मिर्जा के रिश्ते को भी उन्होंने बाप और बेटे के यथार्थ रिश्ते का स्पर्श दिया जिसमें बाप बेटे से खफ़ा ही रहता है और बेटा सहमा. नाटक के हर किरदार को उन्होंने स्वतंत्रता दी और वे पूरी शिद्द्त से उभरे. सांप्रादयिकता के और पहलुओं को भी दिखाने की कोशिश की जिसमें आर्थिक आधार भी शामिल था. सिकंदर मिर्जा अपने पीछे संपत्ति छोड़ आये हैं और यहां जो मिली है उस पर पहलवान कब्जा जमाना चाहता है. पहलवान दंगों मे इसलिए अधिक सक्रिय है कि वह संपतियां बटोर सके. नाटक में इसके लिये उन्होंने संवादों में भी बदलाव किया. नाटक के अंत को बदलते हुए उन्होंने वृद्धा और मौलवी की अंतिम यात्रा को एकसाथ स्टेज पर दिखाया गया था. जिससे दंगा जन्म ले लेता है और इसी के बाद जुल्म जब बढ़ता है तो मिट जाता है गीत के साथ नाटक समाप्त हो जाता है. नाटक में हबीब तनवीर ने यथार्थवादी ढांचे को नहीं छेड़ा था. दृश्यबंध बहुत ही सांकेतिक रूप से यथार्थवादी है, दो दीवारों के सहारे बीच में और जाती सीढियां जिस पर पर्दा खींच देने से वहां चाय की दुकान और मस्जिद भी बना लिया जाता था. धरातल का प्रयोग करके बाहर और अंदर के दृश्य निर्मित कर लिए गये थे. नाटक में प्रकाश का संयोजन प्रभावशाली था खासकर दिवाली में जो उत्सव का दृश्य था. ऐसे दृश्यों को रचने में हबीब तनवीर को महारथ थी. मौलवी की हत्या के दृश्य में अजान पढ़ते हुए आने वाली रोशनी ऐसी है मानो आखिरी रोशनी भी बुझने वाली हो. अभिनय में हबीब तनवीर ने दिलचस्प प्रयोग किया था. माई का केंद्रिय पात्र किसी महिला ने नहीं बल्कि पुरूष ने अभिनय किया था. वैसे यह एक अभावजन्य निर्णय था लेकिन इसके पीछे तर्क यह भी था कि महिलाएं हिंदुस्तानी समाज में उम्रदराज होने के बाद पुरूषोचित रूख अपना लेती हैं. इस चुनौती को शुरुआती प्रस्तुतियों में रंगमंडल के अभिनेता गिरिश ने बखुबी स्वीकार किया. माई के पात्र को पूरी इमानदारी व निष्ठा के साथ प्रस्तुत करने में सफ़ल हुए हैं. गिरिश अपने हावभावों, गतियों, में इतने नियंत्रित रहे कि दर्शक कार्ड या स्मारिक ना पढे तो यह पता चलना मुश्किल है को माई की भूमिका कोई पुरुष अभिनेता निभा रहा है . और हबीब के इस्तेमाल किये गये तरिके का इस्तेमाल आज भी जारी है. आज भी कई निर्देशक माई की भूमिका पुरूष अभिनेता से ही कराते हैं. नाटक के बारे में कहा गया कि कुछ चरित्रों जैसे सिकंदर मिर्जा का इतना विकास नहीं हुआ या उनके बेटे बेटी भी नाटक का अनिवार्य अंग नहीं लगते. नासिर काज़मी के चरित्र को भी गैर जरूरी समझा गया क्योंकि उनकी मौजुदगी का तालमेल प्रस्तुति में नहीं था और वह स्वाभाविक गति में बाधक था. जबकि प्रस्तुति में नासिर काज़मी एक आवाज की तरह थे जो सद्भाव की आवाज थी और जिसमें विस्थापन का दर्द था. सिकंदर मिर्जा का चरित्र वैसे भी माई के चरित्र के आगे गौण होना ही था और बेटे बेटी का भी. प्रस्तुति दर प्रस्तुति ये नाटक की अनिवार्यता बन गये. हबीब तनवीर ने इस नाटक को नया थियेटर के साथ भी किया, जिसमें नाटक का संगीत पक्ष और सशक्त होकर उभरा लेकिन भाषा का तेवर कमजोर पड़ा. असगर वज़ाहत जिन्हें हबीब तनवीर की इस प्रस्तुति से गंभीर आपत्तियां थी कि उन्होंने गंभीरता पर भावुकता और हास्य का रंग चढ़ा दिया. लेकिन उन्हें भी हबीब की प्रस्तुति ही सबसे अच्छी प्रस्तुति लगी . इस प्रस्तुति ने यह साबित किया कि यथार्थवादी नाटकों की अस्मिता खंडित किये बगैर उन्हें अपने मुहावरे में ढालने की यह प्रक्रिया हबीब तनवीर के अन्य नाटकों से कुछ भिन्न होते हुए भी उन्हीं के घराने की एक चीज बन जाती है. हबीब तनवीर द्वारा इस नाटक को प्रस्तुत किये जाने के बाद यह नाटक हिंदी की सबसे अधिक खेली जाने वाली प्रस्तुतियों में है. यह लेख बनास जन के असगर वज़ाहत विशेषांक में छपे लेख का हिस्सा है.


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