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झूठ के अंधाधुंध प्रयोग से अब मोदी के सच पर भी सवाल--अरुण माहेश्वरी
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फेक न्यूज़ का मसला आज दुनिया का एक बड़ा सरदर्द बन गया है। उधर अमेरिका में ट्रंप ने पिछले चुनाव में झूठी ख़बरों की बाढ़ ला दी थी तो इधर मोदी-शाह युगल भी इस मायने में ट्रंप से कभी उन्नीस नहीं, बल्कि इक्कीस ही रहे हैं। सचमुच, आरएसएस-भाजपा तो हमारे देश में इस संसार के बेताज के बादशाह हैं। स्वाती चतुर्वेदी की किताब 'I am a Troll' में सारे प्रमाणों के साथ यह बताया गया है कि मोदी-शाह युगल ने फेक न्यूज़ की बाक़ायदा एक विशाल फ़ैक्टरी खोल रखी है। हाल में बंगाल में सांप्रदायिक दंगे लगाने में इनकी बंगाल की आईटी शाखा किस प्रकार लगी हुई थी, उसके सारे प्रमाण सामने आ चुके हैं। इस शाखा के प्रमुख तरुण सेनगुप्ता को इस अपराध के लिये गिरफ़्तार भी किया जा चुका है। उन्होंने बांग्लादेश और न जाने कहां-कहां की तस्वीरों को काट-छाँट कर बंगाल की बताने और मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने का जघन्य काम किया था। संगठित झूठ ने सार्थक विमर्श को बनाया कठिन बहरहाल, सारी दुनिया के विवेकवान लोगों की तरह ही भारत में भी संगठित रूप में झूठ के जरिये किसी भी प्रकार के सार्थक विमर्श के लिये कोई जगह न छोड़े जाने पर चिंता पैदा होने लगी है। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर गूगल की तरह के बड़े संस्थान ने जहाँ फेक न्यूज़ के प्रवाह को रोकने के लिये अपनी ओर से एक पहलकदमी करने का निर्णय लिया है, वहीं भारत में भी ऐसी वेबसाइट्स तेज़ी से विकसित हो रही है जो सिर्फ ख़बरों के झूठ-सच की जांच में ही लगी हुई हैं और यथासंभव लोगों को इस डरावनी बीमारी से अवगत कराने की कोशिश कर रही हैं। इधर चंद दिनों में ही एनडीटीवी पर रवीश कुमार ने प्राइम टाइम पर लगातार चार एपीसोड अकेले इसी विषय पर किये हैं। इसमें उन्होंने झूठ के इस कारोबार को कई ऐतिहासिक संदर्भों के साथ, मसलन नई सहस्त्राब्दि पर सारे कम्प्यूटरों के ठप हो जाने के वाईटूके के विषय से लेकर 'मंकी मैन' और गणेश जी को दूध पिलाये जाने वाले वाकयों का भी बार-बार उल्लेख किया है। इसके राजनीतिक संदर्भों में उन्होंने हिटलर के प्रचार मंत्री गोयेबल्स से लेकर डोनाल्ड ट्रंप की भी चर्चा की है। झूठ की ताकत को कम करके आंकना गलत इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि हम सत्य की अपराजेय शक्ति की जितनी अभी बात क्यों न करे, मानवता का इतिहास झूठ की समान, बल्कि कहीं ज्यादा शक्ति का परिचय देने वाला इतिहास रहा है। हम सब जानते हैं, सचाई का रास्ता एक कठिन रास्ता है। सच को अपने को स्थापित करने में लंबा समय लग जाता है। इसके लिये बेहिसाब ख़ून, पसीना और आँसू बहाना पड़ता है। लेकिन झूठ भी जीवन का एक सच होने के नाते ही, उसकी शक्ति सच से कम नहीं होती है। दार्शनिक दृष्टि से सख़्ती से देखने पर हम पायेंगे कि मानव जीवन में पाये जाने वाले सारे मिथ, ईश्वर से लेकर तमाम प्रकार के अंध-विश्वास झूठ नहीं तो और क्या कहलायेंगे? लेकिन मनुष्य के जन्म के साथ ये उसके अस्तित्व से किसी न किसी रूप में जुड़े रहे हैं। इसीलिये यहाँ सवाल किसी दार्शनिक दृष्टि का नहीं है। फेक न्यूज़ का मसला जीवन और इतिहास के बहुत मोटे-मोटे तथ्यों से जुड़ा हुआ है। मसलन भारत 15 अगस्त 1947 के दिन आज़ाद हुआ था। यह एक कोरा तथ्य है। इसी प्रकार के कोरे तथ्यों की श्रृंखला से हम इतिहास और अपने जीवन का आख्यान तैयार करते हैं। ठगों का गिरोह बन गयी है केंद्र सरकार फेक न्यूज़ वह रोग है जो जीवन के ऐसे ठोस तथ्यों में सेंधमारी करता है। उसे तोड़-मरोड़ कर अपना उल्लू सीधा करने के लिये इस प्रकार विकृत कर देता है जैसे जातक कथा में ठगों के एक गिरोह में बकरी ले जा रहे ब्राह्मण को बार-बार टोक कर यह मानने के लिये मजबूर कर दिया कि वह अपने कंधे पर बकरी नहीं, बल्कि कुत्ता ले जा रहा है। और इस प्रकार ब्राह्मण से उसकी बकरी को झपट लिया। इसीलिये फेक न्यूज़ का मुद्दा शुद्ध रूप से ठगबाजों से लड़ाई का मुद्दा है। आज जब यह पता चलता है कि भारत की राजनीति में फेक न्यूज़ का सबसे बड़ा और संगठित काम मोदी-शाह के नेतृत्व में भाजपा कर रही है तो इसी नतीजे पर पहुँचा जा सकता है कि हमारा आज का शासक दल ठगों का एक विशाल गिरोह है। क्योंकि इसमें कोई विचारधारात्मक या अवधारणात्मक मुद्दा शामिल नहीं है। इसमें सिर्फ ठोस तथ्यों का विकृतीकरण है, ताकि आम लोगों को भ्रमित किया जा सके। कहना न होगा, ये लोग सबसे अधिक तो अपने सदस्यों और समर्थकों के विश्वास से खेल कर रहे हैं। जनता तो जीवन के अनुभवों से बहुत कुछ समझ लेती है। भारत में शासकों की तमाम कारस्तानियों के बावजूद सरकारें बनती-बिगड़ती रही हैं। कोई अगर यह सोचता है कि झूठ के प्रचार के बल पर वह अनंतकाल तक सत्ता में रह जायेगा तो शायद इससे बड़ा दूसरा कोई भ्रम नहीं होगा। सच भी जब लगने लगेगा झूठ लेकिन इस खेल में जिन लोगों का स्थायी तौर पर नुक़सान हो जाता है, वे हैं इन झूठ के कारोबारियों के समर्थक जो इनके प्रति अंध आस्था के चलते इनकी बातों के लिये मरने-मारने को तैयार रहते हैं। जब गूगल की तरह की सूचना तकनीक के क्षेत्र की कंपनियों ने फेक ख़बरों की शिनाख्त करके उन्हें छाँट देने का एक प्रकल्प अपनाया है तब भी, वह इन भक्तों के लिये किसी काम का नहीं होगा।बहरहाल, जीवन में झूठ के सच को स्वीकारते हुए भी हम यही कहेंगे कि झूठ भी जीवन में परिवर्तनों के सापेक्ष होता है। आज चल रहा झूठ कैसे कल पूरी तरह से अचल हो जाता है, इतिहास की गति को कुछ इस प्रकार से भी समझा जा सकता है। जिस दिन लोग समझ लेंगे कि मोदी जी के पास सिवाय झूठी बातों के कुछ नहीं है, उनकी सच्ची बातें भी सबको झूठ लगने लगेंगी और वहीं से इनके अंत का भी प्रारंभ हो जायेगा। इसीलिये राजनीति में अंतत: मामला जन-अवधारणा का होता है और शायद मोदी जी यह नहीं जानते कि नोटबंदी, जीएसटी और उनके विदेश-प्रेम ने अब तक उनके व्यक्तित्व की सच्चाई को खोल दिया है; उनके प्रति जनता के विश्वास में गिरावट का चक्र शुरू हो चुका है। झूठ, वह कितना ही बड़ा हो और कितने ही मुखों से क्यों न फैलाया जा रहा हो, संभवत: आगे उनके लिये मददगार साबित नहीं होगा। (लेखक साहित्यकार, स्तंभकार और लेखक हैं और आजकल कोलकाता में रहते हैं।)


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